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रविवार, 31 दिसंबर 2017

~ अंतिम बात ~







अट्टहास करती
मुंह चिढ़ाती जिन्दगी
प्रचंडता के पैमाने तोड़ती
अंसंख्य आवाजे 
तथाकथित अपनों के
ढेर सारे निर्देश

वक्त के असंख्य घाव
वेदना देते शब्द बाण
सामाजिक धुएँ की घुटन
मूर्च्छित सा घायल अंतर्मन
स्वाभिमान की खातिर
बस लाश न बन सका

बरसों की निष्ठां को
ठेंगा दिखाती दूरियाँ
मुस्कराहट की आड़ मे
कटुता का तीखा प्रहार
रिश्तों की अग्नि परीक्षा मे
असफल होते कई नाम

क्या खोया और क्या पाया
आज नहीं गिनना चाहता फिर भी
सब पाया ही है आज तक
सुख - दुःख, दोस्त - दुश्मन
खोया वक्त व् विश्वास आज तक
यही मेरी इस साल की 'अंतिम बात'



-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३१/११/२०१७

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

~ सुना है ~







सुना है
कुछ लोगों का भी
कहना है कि
मैं भाव खाने लगा हूँ
लगता भी होगा 
क्योंकि अब मैं
उनके भावो के बहकावे में नही हूँ
उनके शब्दों का गुलाम नही हूँ
उनकी आवाज को सुनता नही हूँ
हाँ सच है
उनके ठहराए नियमों से विलग
अपने नियमो का
निष्ठापूर्वक पालन करता हूँ 
अपनी दुनियाँ मे
चुने हुए अपनों के साथ
यहाँ तक कि आभासी दुनिया में
स्वछंद विचरण करता हूँ
दूसरो की खुश की चाह न कर
खुद मे ख़ुशी की
तलाश मे निरंतर प्रयासरत हूँ 

हाँ, प्रेम, मान - सम्मान सब था
जब तक रिश्ते मे इज्जत थी
जब तक स्नेह की डोर बंधी थी
बनते बिगड़ते अहसासों की कद्र थी 
रिश्ते मे पवित्रता का समागम था  
एक ख़्वाब के टूटने का भय था
एक व्यक्तित्व को खोने का डर था
अपने का साथ छूटने की कशमकश
रिश्ते को मजबूती प्रदान करती थी

दायरा न रखा, न बनाया था
लेकिन
स्वचेतन से मर्यादित होकर
हर व्यक्तित्व को
उसके स्थान पर
आदर या स्नेह से सदा संवारा
लेकिन अब
अपना अपमान मुझे नही गँवारा  


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३०.११.२०१७

रविवार, 3 दिसंबर 2017

एक प्रश्न





लेखक कभी
पूर्ण नहीं होता है
उसके दिमाग का
विद्यार्थी
आजीवन सीखता है
नम्रता उसका
व्यक्तित्व बन जाता है
तब शब्द और भाषा
उसकी अनुयायी हो जाते हैं
साहित्य की सेवा उसका
उद्देश्य और कर्म  बन जाते हैं

लेकिन
लिखने का शौक
आधुनिकता की अंधी दौड़ में
कलम को छोड़
कम्प्युटर में जुड़ गया
शब्दों का ज्ञान
शब्दों की खोज अब
गूगल में सिमट गई
सच कहूं - शब्द अब
अक्ल के सूखे खलिहान में
नकल से उभर कर
साहित्य की शक्ल में
दखल देने लगे है
शब्द भाव, अशुद्धता की बेड़ी में
छ्टपटहाट महसूस करते है
तथाकथित रचनाकारों ने
भ्रम की पट्टी से
अंधे क़ानून की तरह
स्वयं को ताज पहना कर
शहंशाह घोषित कर दिया है
जिनकी अकड़ और घमंड
सर चढ़ कर बोलता है

स्वार्थ व् द्वेष
का कर समावेश
सर्वश्रेष्ठ का
परचम लहराए
परिहास और व्यंग्य
से कर शृंगार
कुतर्क की कर पैरवी
इतिहास को मिटाने
संस्कृति का कर अपमान
संस्कारो पर नस्तर चुभोते
सार्थकता और समाज
की आड़ में
साहित्य का
गला घोटने को तैयार
कुछ रचनाकार और
कुछ उनके चाटुकार

 ‘प्रतिबिम्ब’ का
बस एक प्रश्न
क्या हमारी हिन्दी
सुरक्षित है इस जाल में
नाम के इस खेल में
साहित्य के इस नेतृत्व में ?

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३/१२/२०१७

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

अतीत



~ अतीत ~

कभी मेरा अतीत
मुझसे बात करता है
और जान बूझ कर
जख्म को हरा करना
उसकी आदत बन गया है

मेरे अतीत में
ख्वाइश है जिद्द है
जिसमे सिमटा प्यार
आशीष और रिश्ता है
जो अब कहीं खो गया है

अतीत की मिठास
आज कड़वाहट लिए है
खुल कर मिलते थे जहाँ
आज हमें उनसे पूछ कर
मिलने जाना पड़ता है वहां

अतीत मे संस्कृति
और संस्कार साथ पलते थे
राष्ट्र प्रेम सीने मे धडकता था
अब पश्चिमी संस्कृति प्रतिष्ठा हुई
देश प्रेम कागजी हो गया

अतीत की परछाई
में तमाम चेहरे
अब आभासी हो गए है
और अपना कहने वाले
मुखौटा लगा मिलने आये है

अतीत का सच
आज का सिर्फ झूठ है
साथ छोड़ कर सब
मतलब का हाथ
थाम कर आज ऊंचाई चढ़ते है

अतीत में लोग
अपने 'प्रतिबिम्ब' से
रुक कर मिला करते थे
वो दर्पण जब टूट गया
अब लोग बच कर निकलते है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १७/११/२०१७

बुधवार, 15 नवंबर 2017

लेकिन...



जिंदगी ने मुझे सिखाया बहुत लेकिन
रो पड़ता हूँ अक्सर अपनों को हौसला देते देते

चमत्कार की उम्मीद रहती है लेकिन
किस्मत और वक्त समझा जाते है चलते चलते

रिश्ते बड़े मुश्किल से बनते हैं लेकिन
तोड़ जाते है लोग अक्सर अपना कहते कहते

अकेला चला था सुकून की चाह में लेकिन
ज़माना बीत गया दोस्तों चैन की नींद सोये हुए

बहुत सुनी उनकी अधूरी बाते लेकिन
मतलब समझने से पहले लोग अलविदा कह गए

जानता हूँ मैं रीत दुनियां की लेकिन
चलता रहा अँधेरे मे एक सुबह की आस लिए

स्नेह प्रेम का था अनूठा रिश्ता लेकिन
जाते जाते वो दर्द को हमारे नाम कर गई

हमसे बड़ी बेरुखी से दूर हुए थे लेकिन
खुदा के सामने उनके लिए मेरी दुआ निकल गई

न लौटेंगे बीते दिन 'प्रतिबिम्ब' लेकिन
यादों की हर लहर सूखी आँखों को नम कर गई

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १५/११/२०१७

सोमवार, 6 नवंबर 2017

एक बार...







चाहे तुम इंकार करो कितना
मुझे मिलना ही है तुमसे एक बार 

नसीब मिलकर बिझड़ना ही सही 
तुम्हारा दीदार करना है मुझे एक बार 

दिन रात बिछोह की आग ही सही 
मुझे उस आग मे जलना है एक बार 

तुझ तक पहुँचना कठिन ही सही 
पहुंचूंगा तो सही तुझ तक एक बार 

मेरे होने को करो नज़रन्दाज ही सही 
मर कर एहसास कराना है तुम्हें एक बार 

तुम्हें मेरे एहसासों का एहसास न सही 
मुझे अंगारों सा जलता देख लेना एक बार 

शायद मेरी राख से मिलने आओगे तो सही 
बस ठंडी राख को छू लेना तुम एक बार 

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ६.११.२०१७

मंगलवार, 30 मई 2017

रिसते रिश्ते



कर मेरे जज्बातों का कत्ल
लोग अब अंगुली मुझ पर उठाने लगे हैं
रूककर, थाम हाथ अपनों का
लोग अब कहीं अपनी जगह बनाने लगे हैं

अपने हालातों का कर जिक्र
वक्त की आड़ में रिश्ते रिसने लगे हैं
घोट गला मेरी चाहत का
वे ख़ुशी अपनी समेट मुस्कराने लगे हैं

कर दूर गलतफहमियों को
पा लिया सबने, जो उनका था खोया
पर लगा इल्जाम सोच पर मेरी
मिला जितना, पल भर में जैसे मैंने खो दिया

दूरी बना कर साथ चलना
एक अजब रिश्ता उनकी खुशी ने बना लिया
नहीं मंजूरी हमें कुछ कहने की
मौन को मेरे हर प्रश्न का उत्तर बना लिया

माना जिसे और अपना कहता रहा
मेरे बुरे वक्त में वो लोग हमसे दूर जाते रहे
थी उम्मीद जहाँ मिलन की ‘प्रतिबिम्ब’
मगर वक्त संग वहाँ, फासले अब वो बनाते रहे

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३०/५/२०१७

गुरुवार, 30 मार्च 2017

~वो अलविदा कहने आये हैं ...~



किस्मत का किया था शुक्रिया 
जब उनसे हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी 
ख़ुशी बनकर साथ चले लेकिन 
भूल गया था किस्मत बदलते देर नहीं लगती

इन रिश्तों की अजब कहानी
याद करें न कोई हमें, फिर भी इंतज़ार रहता है
नम आँखे झूठ बोलती नहीं
दर्द दिया जिसने, वही दुआओं में मेरी रहता है

सिखाया था हमने प्यार जिन्हें
वे जमाने से, गजब की बेरुखी सीख कर आये है
हद तो तब हो गई यारों
जब वो सीख कर, हम पर ही आज़माने लगे है

दिल को कई बार तसल्ली देता हूँ
लेकिन उसे हौसला देते हुए, दिल रो पड़ता है
खोलूँ कैसे 'प्रतिबिम्ब', ये बंद दरवाज़ा
जबकि जानता हूँ वो अलविदा कहने आये हैं

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३०/३/२०१७

सोमवार, 27 मार्च 2017

~हालात की नज़र~




हमें जिन्दा देख कर हैरान है अपना कहने वाले
दर्द में हमें देख कर भी बहुत है नज़र फेरने वाले

वक्त के दर्द का घाव अंदर ही अंदर रिसता रहा
उभरती हुई हसरतो को बेपनाह दर्द मिलता रहा

मैंने लगा लिया गले जो आज तक वक्त ने दिया
वक्त की मजबूरियां होगी जो उसने हँसने न दिया

अस्तित्व मेरा स्वयं खुश रहने की कला सीख रहा है
वरना यहाँ बिगड़े हालात पर खुश होने वाले बहुत है

जानता हूँ एक दिन किस्मत अपनी खिल खिलायेगी
मगर 'प्रतिबिंब" तब तक कई रिश्तों की विदाई हो जायेगी

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २७/३/२०१७ 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

यहाँ वहाँ...




टुकड़ो टुकड़ो में प्यार 
अब तक ऐसी है अपनी यात्रा 
एहसासों की 
बहुत कम है मिश्रित मात्रा 
फिर भी तुम्हारी कही 
कई बातो में से 
कुछ एक को रेखांकित किया है
जिसे खुद ही बुदबुदाता हूँ 
भावनाओं का उबाल 
न जाने कितनी बार 
उबल कर बिखर गया 
यहाँ वहाँ

कई बार 
तुम्हारी लिखी रचनाओं को 
पढ़ा है 
इनमे बहुत बार खुद को ढूँढा है 
लेकिन नाकामी हासिल हुई 
थोड़ा बहुत 
किसी कोने में खुद को 
गिरा, असहाय महसूस किया है 
हाँ जो चाहता था खुद के लिए 
उसे सार्वजनिक रूप में 
लिखा हुआ नज़र आ ही गया 
यहाँ वहाँ

वक्त की बेहरमी और 
खुद की व्यस्तता में भी 
सुकून ढूँढने वाला 
तन - मन आज 
नज़र फेरने में 
पहले स्थान पर है 
लम्बे सफर में 
उतार चढ़ाव का वेग 
अपनों की 
पहचान कराने में सक्षम है 
फिर भी 
 एक भरोसे से भी
बिखर जाता है अस्तित्व 
यहाँ वहाँ

गागर में सागर लिए 
एहसास का गुलदस्ता
ख़ूबसूरत नज़र आता है 
लेकिन
भविष्य के दर्पण में
'प्रतिबिम्ब' 
धुंधला नज़र आता है 
 साथ होकर भी
गुलाब और कांटे
साफ़ साफ़ नज़र आते है 
गुल्दस्ते के कुछ फूल 
शायद बिखर गए है 
यहाँ वहाँ
-
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १८/०२/२०१७

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

उदासी



उदासी.....  


क्या रंग है उदासी का
क्या रूप है उदासी का
कौन सा मौसम है उदासी का
उदासी में
केवल रात ही नज़र आती है
इसमें न धूप खिलती है
न ही शाम होती है
बस अन्धकार ही अन्धकार
समुद्र की गहराई लिए अँधेरा
बस डूबता जाता है इंसान
तब लगता है कि
तैरना जानते ही नही
मौत ही एक रास्ता नज़र आता है
सब कुछ छोड़ जाने को
हर मुसीबत से छुटकारा पाने को
मन करता है
चुपचाप अलविदा कहने को ....

गीली मिट्टी लिए हुए रास्ता
दलदल बन खींचता है अपने में
हल्की रोशनी मिलते ही
हर परछाई, अनहोनी होने का
आभास दे जाती है
और हर एक आहट
डर का श्रीगणेश करती है
ख़्वाब और ख्वाइशे
दम तोड़ते हुए
आखों से ओझल हो जाते है.... 

पीला चेहरा स्याह सा उभर
अँधेरे की भेंट चढ़ता जाता है
वजह बेवजह खुद पर दोष
स्थापित करता हुआ - शून्य दिमाग
आँख खुलने पर
नींद खुलने का अफ़सोस करता है
निराशाओं का आँचल लहराकर
पूरे बदन को ढक लेता है
कफ़न की भांति ....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १/२/२०१७

रविवार, 29 जनवरी 2017

अकेले में ...



अकेले में ...

अकेले में
रोने के बाद
आँखों से दिखती है
एक दुनिया
जिसमे सब कुछ
साफ़ साफ़ नज़र आता है
ये वही दुनिया है
जिसने मजबूर किया
आंसुओं को जन्म लेने से
लेकिन
आँखों में पड़ी 
दुनियादारी की गंद
आखिर निकल गई ...


दुनिया में जितने लोग
उतने ही
इल्जाम लिए सर पर
अनगिनत अंगुलियाँ
उठती और भेद देती
खंजर की तरह
मेरे अस्तित्व को गहराई तक
जख्म नासूर बन रिसते रहे
कुरेदते हुए जख्मों पर
नमक डालने की प्रक्रिया में
सक्रिय मेरे अपने....
   
अँधेरे से डरी और
सिहरी हुई  मनोदशा
निढ़ाल होकर रेंगती हुई
ऐसे में
पौ फटने का इंतजार
किसे नही होता
लेकिन आँखों पर
और किस्मत पर
अँधेरे की काली स्याही
अपने हस्ताक्षर कर चुकी हो 
तो आशा और उम्मीद
करना बेमानी होगा......

-       - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २९/०१/२०१७

बुधवार, 25 जनवरी 2017

उत्तर




उत्तर ...

मैं
बहुत सवाल करता हूँ न ?
खामोश रात के बीतते ही
सुबह से लेकर शाम तक
शोर
प्रश्नों की बौछार!!!
फिर भी तुम
बिना तंग हुए
स्थिति के मध्य्नज़र
देती हो बेहतर उत्तर
परिस्थिति से
सामना कराते उत्तर
प्रेम से सराभोर 
शरीर के रोम रोम से
उभरते अहसास
बेहिचक
बन जाते है
सटीक उत्तर

बचपन की उत्सुकता लिए
तुम्हारे अनगिनत प्रश्न 
लेकिन मैं तो तुम हूँ
तुम्हारे ही प्रश्नों के
कहे अनकहे उत्तर
और सच कहूं
मैं  बनता जा रहा हूँ
केवल तुम्हारा उत्तर
और जीने लगा हूँ
वो दायरा
जिसकी सीमा तुम हो ....


-       -   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २५/०१/२०१७

रविवार, 22 जनवरी 2017

अंधेरे में....



अंधेरे में....

तलाशता रहा
अंधेरे में खुद को
अंधेरे में वक्त को
अंधेरे में किस्मत को
मगर
कोई उत्तर न मिल पाया
अंधेरे से
गुफ्तगू करने की ठान
हिम्मत जुटा पुकारने लगा
आँखे बड़ी कर
खुद को निपुण समझ
अपना ही वजूद ढूँढने लगा

अँधेरे में
अपना अक्श, अपना ‘प्रतिबिम्ब’
पहचानने से इंकार करने लगा
अपनों की पहचान में
कई नाम लिख डाले
लेकिन भूल गया था
अँधेरे में काली स्याही  
को कौन पढ़ पायेगा
कौन हाथ जला
एक रोशनी
मुझ तक पहुंचा पायेगा

लेकिन यकीन है
एक सुबह तो आयेगी
अँधेरे को चीरती हुई
विशिष्ट रोशनी से
चिन्हांकित करते हुए  
तब वक्त भी
तब किस्मत भी
नहीं रोक पायेगी
सुबह को आने से
उन किरणों को
मुझसे मिलने से  

-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २२/०१/२०१७
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