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बुधवार, 7 अगस्त 2013

जिन्दगी कभी यूं भी ....




तूफ़ान से की थी दोस्ती, वो रोशनी बुझा गया
खौला था जो खून, अरमान सारे झुलसा गया
चला जब अंगारों पर, सपनो को जलाता गया
फूलो की ख्वाइश में, कांटो से छलनी हो गया

माना था जिसे दोस्त,  वो दुश्मनी निभा गया
समझा जिसे अपना,  वो आज पराया हो गया
वफ़ा की थी जिससे उम्मीद, वो बेवफा हो गया
दस्तूर दुनिया का, जिसे चाहा वो दूर हो गया

किया जुर्म दिलो ने, लम्हो से शिकायत हो गई
माँगा मशविरा अपनों से, बात अपनी आम हो गई
दुश्मन की चाल 'प्रतिबिंब' काम अपना कर गई
धोखा दे गई किस्मत और बदनाम हमें कर गई  

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