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रविवार, 3 दिसंबर 2017

एक प्रश्न





लेखक कभी
पूर्ण नहीं होता है
उसके दिमाग का
विद्यार्थी
आजीवन सीखता है
नम्रता उसका
व्यक्तित्व बन जाता है
तब शब्द और भाषा
उसकी अनुयायी हो जाते हैं
साहित्य की सेवा उसका
उद्देश्य और कर्म  बन जाते हैं

लेकिन
लिखने का शौक
आधुनिकता की अंधी दौड़ में
कलम को छोड़
कम्प्युटर में जुड़ गया
शब्दों का ज्ञान
शब्दों की खोज अब
गूगल में सिमट गई
सच कहूं - शब्द अब
अक्ल के सूखे खलिहान में
नकल से उभर कर
साहित्य की शक्ल में
दखल देने लगे है
शब्द भाव, अशुद्धता की बेड़ी में
छ्टपटहाट महसूस करते है
तथाकथित रचनाकारों ने
भ्रम की पट्टी से
अंधे क़ानून की तरह
स्वयं को ताज पहना कर
शहंशाह घोषित कर दिया है
जिनकी अकड़ और घमंड
सर चढ़ कर बोलता है

स्वार्थ व् द्वेष
का कर समावेश
सर्वश्रेष्ठ का
परचम लहराए
परिहास और व्यंग्य
से कर शृंगार
कुतर्क की कर पैरवी
इतिहास को मिटाने
संस्कृति का कर अपमान
संस्कारो पर नस्तर चुभोते
सार्थकता और समाज
की आड़ में
साहित्य का
गला घोटने को तैयार
कुछ रचनाकार और
कुछ उनके चाटुकार

 ‘प्रतिबिम्ब’ का
बस एक प्रश्न
क्या हमारी हिन्दी
सुरक्षित है इस जाल में
नाम के इस खेल में
साहित्य के इस नेतृत्व में ?

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३/१२/२०१७

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

अतीत



~ अतीत ~

कभी मेरा अतीत
मुझसे बात करता है
और जान बूझ कर
जख्म को हरा करना
उसकी आदत बन गया है

मेरे अतीत में
ख्वाइश है जिद्द है
जिसमे सिमटा प्यार
आशीष और रिश्ता है
जो अब कहीं खो गया है

अतीत की मिठास
आज कड़वाहट लिए है
खुल कर मिलते थे जहाँ
आज हमें उनसे पूछ कर
मिलने जाना पड़ता है वहां

अतीत मे संस्कृति
और संस्कार साथ पलते थे
राष्ट्र प्रेम सीने मे धडकता था
अब पश्चिमी संस्कृति प्रतिष्ठा हुई
देश प्रेम कागजी हो गया

अतीत की परछाई
में तमाम चेहरे
अब आभासी हो गए है
और अपना कहने वाले
मुखौटा लगा मिलने आये है

अतीत का सच
आज का सिर्फ झूठ है
साथ छोड़ कर सब
मतलब का हाथ
थाम कर आज ऊंचाई चढ़ते है

अतीत में लोग
अपने 'प्रतिबिम्ब' से
रुक कर मिला करते थे
वो दर्पण जब टूट गया
अब लोग बच कर निकलते है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १७/११/२०१७

बुधवार, 15 नवंबर 2017

लेकिन...



जिंदगी ने मुझे सिखाया बहुत लेकिन
रो पड़ता हूँ अक्सर अपनों को हौसला देते देते

चमत्कार की उम्मीद रहती है लेकिन
किस्मत और वक्त समझा जाते है चलते चलते

रिश्ते बड़े मुश्किल से बनते हैं लेकिन
तोड़ जाते है लोग अक्सर अपना कहते कहते

अकेला चला था सुकून की चाह में लेकिन
ज़माना बीत गया दोस्तों चैन की नींद सोये हुए

बहुत सुनी उनकी अधूरी बाते लेकिन
मतलब समझने से पहले लोग अलविदा कह गए

जानता हूँ मैं रीत दुनियां की लेकिन
चलता रहा अँधेरे मे एक सुबह की आस लिए

स्नेह प्रेम का था अनूठा रिश्ता लेकिन
जाते जाते वो दर्द को हमारे नाम कर गई

हमसे बड़ी बेरुखी से दूर हुए थे लेकिन
खुदा के सामने उनके लिए मेरी दुआ निकल गई

न लौटेंगे बीते दिन 'प्रतिबिम्ब' लेकिन
यादों की हर लहर सूखी आँखों को नम कर गई

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १५/११/२०१७

सोमवार, 6 नवंबर 2017

एक बार...







चाहे तुम इंकार करो कितना
मुझे मिलना ही है तुमसे एक बार 

नसीब मिलकर बिझड़ना ही सही 
तुम्हारा दीदार करना है मुझे एक बार 

दिन रात बिछोह की आग ही सही 
मुझे उस आग मे जलना है एक बार 

तुझ तक पहुँचना कठिन ही सही 
पहुंचूंगा तो सही तुझ तक एक बार 

मेरे होने को करो नज़रन्दाज ही सही 
मर कर एहसास कराना है तुम्हें एक बार 

तुम्हें मेरे एहसासों का एहसास न सही 
मुझे अंगारों सा जलता देख लेना एक बार 

शायद मेरी राख से मिलने आओगे तो सही 
बस ठंडी राख को छू लेना तुम एक बार 

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ६.११.२०१७
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